ज्वर निवृत्ति के लिए मंत्र :
{1) मंत्र: दोऊ माई ज्वर सुरा महाबीर नाम। दिन राति खटि मरे महादेव ।ठाम।। फुर छुदसे छत्तिस रूप मुहूर्त म धराय। नाराज नामूक के घर-दआर
फिराय ।। ज्चाला ज्वरपाला ज्वरावाला ज्चर विशाकि । दाह ज्चर उमा ज्चर भमा चर
झूमकि।। घोड़ा ज्वर भूता तिजारी ओ चौथाई। सवन को भंगक घोटन शिव ने
बुझाई। यह ज्वर ज्वर सुरा तू कौन तकाव। शीघ्र अमु अंग छोड़ तुम जव ।। यदि
अंगन में तू भूलि भटकाय ।। तो महादेव के लागा तूं खाय।। आदेश कामरू कामाख्या
माई। आदेश हाड़ी दासी चण्डी की दोहाई।। ।
हर प्रकार का विषम ज्चर इस मंत्र से शान्त होता है। रोगी का मुख उत्तर
की ओर होना चाहिए। सात बार मंत्र का उच्चारण करके रोगी को झाड़ें। यह क्रम
तीन दिन तक लगातार चलता रहे तो हर प्रकार के ज्चर की निवृत्ति होती है।
(2) मंत्रः ओं नमो भगवते छन्दी छन्दी अमुकस्य ज्वरस्य शर प्रज्वलित
पशूपानिये परशाय फट्।
इस मंत्र को कागज पर लिखकर ताबीज की तरह रोगी के गले में बांधना
चाहिए। मंत्र में जहां अमुक लिखा है, वहां रोगी का नाम लिखें। इससे हर प्रकार
का ज्वर शांत होता है।
(3) मंत्रः–ओं विध्न वानन हुं फट् स्वाहा।
| पान पर चूने से इस मंत्र को लिखकर रोगी को खिलायें तो चर की निवृत्ति
होती है।
(4) मंत्रः–ओं केवरम् ते मुखं रुद्रङ्ग नन्दी मां बहिन जो रङ्ग मृत्यु भ्यंग जो रङ्ग
नाश्यते ध्रुवम् ।।
आम के पत्ते को घृत में डुबोकर अग्नि में आहति देनी चाहिए। एक हजार
आहुतियां देने से लाभ होता है।
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