शुद्ध अष्टमी से पूर्णिमा तक बहन को सुबह स्नान करना चाहिए। एक छोटी कटोरी में पान (खाने का पान) टपरी से लेकर, पान के पत्तों का रस निचोड़ लें। इस रस में जायफल का रस मिलाकर, नाभि पर X फूली बना लें। जब यह सूख जाता है, तो फूल के स्थान पर एक सुखद गंध आती है। इस लेप को पूरे दिन लगा रहने दें और अगले दिन स्नान के समय धो दें। फिर खाने के पान का रस वापस लें, उस रस में जायफल उबालें और नाभि पर X फूली को फिर से बना लें। एक फल ही पर्याप्त है। इसी प्रकार सात दिनों तक एक ही फल का उपयोग करना चाहिए। कोई अन्य नहीं। यह उपाय मासिक धर्म से लगभग सात दिन पहले करने पर भी काम करता है। गर्भाशय से जुड़ा ध्यान आकर्षित करता है और गर्भाशय को अपना काम करने में अधिक सक्षम बनाता है। इस उपाय के परिणामस्वरूप कई बहनों को पुत्रप्राप्ति का लाभ हुआ है। मेरी दादी मुझसे यही कहती थीं। उपरोक्त उपाय करते समय खट्टे पदार्थ (छाछ, दही, इमली, नींबू आदि) का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
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पुत्रप्राप्ति हेतु विधि , Pregnant Woman , पुत्रप्राप्ति हेतु उपाय
निर्गुण्डी कल्प/ Nirgundi ke fayde/ निर्गुन्डी के औषदि फायदे / निर्गुन्डी के तांत्रिक उपाय
निर्गुण्डी कल्प
निर्गुण्डी का दूसरा नाम सिन्दुवार भी है, अन्य भाषा में इसे नगौड़ भी कहते है। निर्गुण्डी का वृक्ष पर्याप्त ऊंचा बढ़ता है। इसकी प्रत्येक शाखा में लम्बे और पतले तीन-तीन अथवा पांच-पांच पत्र (पत्ते) होते हैं। इसके फल मञ्जरी के समान गुच्छेदार और जामुन जैसे रंग के होते हैं। इसके बीजों को रेणुक बीज कहते हैं।
इसका प्रयोग निम्न होता है।
रात्रि के समय अकेले ही वृक्ष के पास जाएं और 'ॐ नमो गणपतये कुबेरायैकदन्ताय फट् स्वाहा' मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा करें। इस प्रकार सात रात्रि तक करने से वृक्ष सिद्ध होकर अत्यन्त गुणकारी बन जाता है। बाद में इस वृक्ष की छाल का चूर्ण और जीरे का चूर्ण समभाग में एकत्र करके आठ दिन तक सेवन करें। इसके सेवन से ज्वर दूर हो जाते हैं, भूमिगत द्रव्य जानने की क्षमता प्राप्त होती है तथा अधिक दिन तक सेवन करने से शारीरिक बल की वृद्धि होती है।
निर्गण्डी के पत्तों का रस निकालकर इक्कीस दिनों तक प्रात:काल में वैद्य की सलाह से सेवन करें तथा इन दिनों में भोजन बहुत हल्का करें। खिचडी आदि का सेवन करने से योगसाधना अथवा अन्य मन्त्रसाधना में मानसिक शान्ति, आत्मबल तथा शारीरिक स्वस्थता की प्राप्ति होती है।
मिर्गी रोग के लिये शाबर मंत्र/ mirgi rog ke liye shabar mantr
मिर्गी रोग के लिये शाबर मंत्र
ॐ हलाहल सरगत मंडिया पुरिया
श्री राम जी फूंके मिर्गी बाई सूखे
सुख होय ॐ ठः ठः स्वाहा
दिन - रविवार/ शुभ मुहूर्त
जप - १०८
माला - रुद्राक्ष
विधी - २१ बार जप कर के भोज पत्र पर अष्टगंध से अनार की कलम से मंत्र लिखकर काले धागे मे बांधकर ताबिज मे भोजपत्र डालकर धूप/अगरबत्ती दिखाकर गले मे धारण किजीये l
ज्वर निवृत्ति के लिए मंत्र
ज्वर निवृत्ति के लिए मंत्र :
{1) मंत्र: दोऊ माई ज्वर सुरा महाबीर नाम। दिन राति खटि मरे महादेव ।ठाम।। फुर छुदसे छत्तिस रूप मुहूर्त म धराय। नाराज नामूक के घर-दआर
फिराय ।। ज्चाला ज्वरपाला ज्वरावाला ज्चर विशाकि । दाह ज्चर उमा ज्चर भमा चर
झूमकि।। घोड़ा ज्वर भूता तिजारी ओ चौथाई। सवन को भंगक घोटन शिव ने
बुझाई। यह ज्वर ज्वर सुरा तू कौन तकाव। शीघ्र अमु अंग छोड़ तुम जव ।। यदि
अंगन में तू भूलि भटकाय ।। तो महादेव के लागा तूं खाय।। आदेश कामरू कामाख्या
माई। आदेश हाड़ी दासी चण्डी की दोहाई।। ।
हर प्रकार का विषम ज्चर इस मंत्र से शान्त होता है। रोगी का मुख उत्तर
की ओर होना चाहिए। सात बार मंत्र का उच्चारण करके रोगी को झाड़ें। यह क्रम
तीन दिन तक लगातार चलता रहे तो हर प्रकार के ज्चर की निवृत्ति होती है।
(2) मंत्रः ओं नमो भगवते छन्दी छन्दी अमुकस्य ज्वरस्य शर प्रज्वलित
पशूपानिये परशाय फट्।
इस मंत्र को कागज पर लिखकर ताबीज की तरह रोगी के गले में बांधना
चाहिए। मंत्र में जहां अमुक लिखा है, वहां रोगी का नाम लिखें। इससे हर प्रकार
का ज्वर शांत होता है।
(3) मंत्रः–ओं विध्न वानन हुं फट् स्वाहा।
| पान पर चूने से इस मंत्र को लिखकर रोगी को खिलायें तो चर की निवृत्ति
होती है।
(4) मंत्रः–ओं केवरम् ते मुखं रुद्रङ्ग नन्दी मां बहिन जो रङ्ग मृत्यु भ्यंग जो रङ्ग
नाश्यते ध्रुवम् ।।
आम के पत्ते को घृत में डुबोकर अग्नि में आहति देनी चाहिए। एक हजार
आहुतियां देने से लाभ होता है।
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