निर्गुण्डी कल्प
निर्गुण्डी का दूसरा नाम सिन्दुवार भी है, अन्य भाषा में इसे नगौड़ भी कहते है। निर्गुण्डी का वृक्ष पर्याप्त ऊंचा बढ़ता है। इसकी प्रत्येक शाखा में लम्बे और पतले तीन-तीन अथवा पांच-पांच पत्र (पत्ते) होते हैं। इसके फल मञ्जरी के समान गुच्छेदार और जामुन जैसे रंग के होते हैं। इसके बीजों को रेणुक बीज कहते हैं।
इसका प्रयोग निम्न होता है।
रात्रि के समय अकेले ही वृक्ष के पास जाएं और 'ॐ नमो गणपतये कुबेरायैकदन्ताय फट् स्वाहा' मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा करें। इस प्रकार सात रात्रि तक करने से वृक्ष सिद्ध होकर अत्यन्त गुणकारी बन जाता है। बाद में इस वृक्ष की छाल का चूर्ण और जीरे का चूर्ण समभाग में एकत्र करके आठ दिन तक सेवन करें। इसके सेवन से ज्वर दूर हो जाते हैं, भूमिगत द्रव्य जानने की क्षमता प्राप्त होती है तथा अधिक दिन तक सेवन करने से शारीरिक बल की वृद्धि होती है।
निर्गण्डी के पत्तों का रस निकालकर इक्कीस दिनों तक प्रात:काल में वैद्य की सलाह से सेवन करें तथा इन दिनों में भोजन बहुत हल्का करें। खिचडी आदि का सेवन करने से योगसाधना अथवा अन्य मन्त्रसाधना में मानसिक शान्ति, आत्मबल तथा शारीरिक स्वस्थता की प्राप्ति होती है।

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